सूरीनाम के सबसे पुराने ज्ञात इतिहास में लगभग 3000 ईसा पूर्व से आदिवासी आबादी के बसने के पुरातात्विक साक्ष्य शामिल हैं। यूरोपीय उपनिवेशीकरण से पहले अरावाक, कैरिब और अन्य आदिवासी समुदायों ने अपने समाज विकसित किए। फ्रांस ने 1644 में एक किला बनाया और 1651 में फ्रांसिस विलॉबी के नेतृत्व में अंग्रेज़ी उपनिवेशीकरण शुरू हुआ। अब्राहम क्राइनसेन ने 27 फरवरी 1667 को फोर्ट विलॉबी पर कब्ज़ा किया और उसका नाम बदलकर फोर्ट ज़ीलैंडिया रखा। ब्रेडा की संधि ने सूरीनाम नीदरलैंड को सौंपा, हालांकि अंग्रेज़ थोड़े समय के लिए लौटे, फिर 1668 में डचों ने उपनिवेश पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया। 1683 से गेव्ट्रोयेर्दे सोसाइटाइट वान सूरीनाम ने बागान उपनिवेश का शासन चलाया। गन्ना, कॉफी, कोको और कपास के बागानों में अफ्रीका से लाए गए गुलाम बनाए गए लोगों से जबरन काम कराया जाता था। यहूदी समुदायों ने 1650 के दशक में कैसिपोरा और 1680 के दशक में जोडेनसावाने बसाया, जहाँ यहूदी बसने वालों को दासता पर आधारित समाज के भीतर असामान्य रूप से अधिक स्वायत्तता मिली। गुलाम बनाए गए लोग भागकर देश के अंदरूनी हिस्सों में गए और मरून समुदाय बनाए। मरून वे लोग हैं जो दासता से भागे लोगों के वंशज हैं और जिन्होंने अपने समुदाय तथा राजनीतिक संबंध स्थापित किए। 1760 में न्ड्यूका, 1762 में सामाका और 1767 में मातावाई के साथ हुई संधियों ने स्वतंत्रता और आंशिक स्वायत्तता को मान्यता दी। इसके बदले गैर-आक्रामकता, सामान की आपूर्ति और बाद में भागे लोगों को लौटाने जैसी शर्तें थीं। बोनी और अलुकु समुदायों से जुड़े संघर्ष इन समझौतों के बाद भी जारी रहे। 1799 से 1816 तक ब्रिटिश शासन रहा। नीदरलैंड ने 1808 में दास व्यापार पर रोक लगाई, 1816 में सूरीनाम लौट आया और उपनिवेश को सीधे ताज के प्रशासन के अधीन कर दिया। नीदरलैंड ने 1863 में दासता समाप्त की, लेकिन स्टात्स्टूज़िख्त के तहत पहले गुलाम बनाए गए लोगों को 1873 तक बागानों में अनिवार्य मजदूरी की शर्तों के अधीन रखा गया। इसके बाद अनुबंधित मजदूरी के लिए 1853 से चीनी और मदीरा के मजदूर, 1873 से 1916 के बीच ब्रिटिश भारत के हिंदुस्तानी मजदूर और 1890 से 1939 के बीच डच ईस्ट इंडीज़ के जावानी मजदूर लाए गए। 1902 में मारियेनबर्ग के बागान में हुई हिंसा में ब्रिटिश भारत से आए 16 अनुबंधित मजदूर मारे गए। सूरीनाम को 1866 में प्रतिनिधि सभा मिली, 1948 में सार्वभौमिक मताधिकार मिला और 1949 में पहले चुनाव हुए। नीदरलैंड के राज्य के 1954 के चार्टर ने सूरीनाम को राज्य के भीतर स्वायत्त देश बनाया। 25 नवंबर 1975 को स्वतंत्रता मिली; जोहान फेरियर पहले राष्ट्रपति बने और 4 दिसंबर 1975 को सूरीनाम संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुआ। 25 फरवरी 1980 को सैन्य तख्तापलट के बाद सैन्य शासन शुरू हुआ। 8–9 दिसंबर 1982 के दिसंबरमोर्डेन के दौरान सैनिकों ने फोर्ट ज़ीलैंडिया में हिरासत में रखे 15 लोगों की हत्या कर दी और संविधान निलंबित कर दिया गया। 1986 से 1992 के बिन्नेनलैंडसे ओर्लोग में नेशनल आर्मी और जंगल कमांडो आमने-सामने थे। लड़ाई में पूर्वी सूरीनाम के समुदाय नष्ट हुए और लोग फ्रेंच गुयाना भागने को मजबूर हुए। 29 नवंबर 1986 को न्ड्यूका मरून गाँव मोइवाना पर हमले में 40 से अधिक लोग मारे गए और बहुत से अन्य विस्थापित हुए। 2005 में अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार न्यायालय ने संपत्ति, आने-जाने की स्वतंत्रता और न्याय तक पहुँच से जुड़े उल्लंघन पाए और मुआवज़े का आदेश दिया। 1987 में नया संविधान अपनाया गया, जिसके बाद चुनाव और आंशिक लोकतंत्रीकरण हुआ। 1990 में बिना रक्तपात का सैन्य तख्तापलट हुआ और 1991 में नागरिक सरकार लौट आई। देसी बाउटर्से 2010 से 2020 तक राष्ट्रपति रहे, फिर 2020 से 2025 तक चान सैंटोखी। 25 मई 2025 को हुए देशव्यापी आनुपातिक चुनाव के बाद 16 जुलाई 2025 को जेनिफर गेरलिंग्स-सिमोंस सूरीनाम की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। सूरीनाम में ऐतिहासिक शोध के लिए नेशोनाल आर्कीफ सूरीनाम, स्कूल पाठ्यक्रम, विरासत कार्यक्रम, सार्वजनिक स्मरण समारोह और स्मारक स्थल उपयोगी हैं। अभिलेखागार में गवर्नरों के अभिलेख, 1921 से जनसंख्या रजिस्टर, 1828 से नागरिक स्थिति के अभिलेख तथा दासता, मुक्तिदान और मुक्ति के रजिस्टर हैं। यूनेस्को ने 1816 से 1969 तक गुलाम बनाए गए लोगों से संबंधित दस्तावेज़ी विरासत को मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड कार्यक्रम में शामिल किया। 2002 में यूनेस्को सूची में दर्ज पारामारिबो का ऐतिहासिक भीतरी शहर सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी की औपनिवेशिक नगरीय संरचना को सँजोता है और इसमें फोर्ट ज़ीलैंडिया शामिल है। 2023 में सूचीबद्ध जोडेनसावाने में सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी की यहूदी बस्ती के अवशेष हैं और आदिवासी, अफ्रीकी तथा यूरोपीय समुदायों के संपर्कों के अभिलेख सुरक्षित हैं। 1 जुलाई को केती कोटी दासता के उन्मूलन, मुक्ति और उसके जारी प्रभावों का स्मरण करता है। इस शब्द का अर्थ है जंजीरें तोड़ना; इसका उपयोग इससे जुड़ी सार्वजनिक स्मृति के लिए भी होता है। डच सरकार ने 19 दिसंबर 2022 को दासता में अपनी भूमिका के लिए माफ़ी माँगी। सूरीनाम में इतिहास की व्याख्याएँ एक जैसी नहीं हैं: औपनिवेशिक प्रशासनिक अभिलेख अक्सर आदिवासी, अफ्रो-सूरीनामी, मरून, हिंदुस्तानी, जावानी और यहूदी दृष्टिकोणों से अलग होते हैं। नेशोनाल आर्कीफ सूरीनाम और ऐतिहासिक स्थल साक्ष्यों तक पहुँच देते हैं, लेकिन पहुँच की शर्तें, खुलने की व्यवस्था और शुल्क संस्थान तथा स्थान पर निर्भर करते हैं। इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन में स्रोतों की आलोचनात्मक जाँच, विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना और आदिवासी तथा मरून समुदायों के प्रति सम्मान आवश्यक है।
सूरीनाम का इतिहास
सूरीनाम के इतिहास में आदिवासी आबादी का बसना, डच औपनिवेशिक शासन, बागानों पर दासता, अनुबंधित मजदूरी, स्वतंत्रता तथा सैन्य शासन और राजनीतिक हिंसा के दौर शामिल हैं। पुरातात्विक साक्ष्य लगभग 3000 ईसा पूर्व से आदिवासी आबादी के बसने का संकेत देते हैं; इसके बाद अरावाक और कैरिब सहित विभिन्न समाज विकसित हुए। सूरीनाम 25 नवंबर 1975 को नीदरलैंड से स्वतंत्र हुआ। तब से उसका विकास संवैधानिक सुधारों, चुनावों और इतिहास की परस्पर विवादित स्मृतियों के बीच हुआ है।
सुझाव
सूरीनाम के इतिहास को एक ही अविराम कहानी के बजाय स्रोतों पर आधारित पड़ताल के रूप में देखें। किसी निश्चित कालखंड या प्रश्न से शुरुआत करें, नेशोनाल आर्कीफ सूरीनाम के अभिलेखों की तुलना प्रभावित समुदायों के दृष्टिकोणों से करें और दर्ज घटनाओं को बाद की व्याख्या तथा स्मरण से अलग रखें। उपलब्ध स्रोतों की पहुँच की शर्तों और उनमें मौजूद कमियों को भी शोध के नतीजे का हिस्सा मानें।

