लापिता सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े लोग 3,000 से अधिक वर्ष पहले फ़िजी द्वीपों में बसे। समय के साथ iTaukei समुदायों ने भूमि उपयोग, मुखिया के अधिकार, व्यापार और धार्मिक व्यवहार की स्थानीय व्यवस्थाएँ विकसित कीं। यूरोपीय संपर्क सत्रहवीं शताब्दी से बढ़ा और उन्नीसवीं शताब्दी में व्यापार, मिशनरी गतिविधियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिए तेज हुआ। औपनिवेशिक शासन से पहले युद्ध और मुखियाओं के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी क्षेत्रीय शक्ति-संबंध बदले। ब्रिटेन ने 1874 में फ़िजी पर अधिकार कर लिया। औपनिवेशिक प्रशासन ने भूमि, कराधान, श्रम और राजनीतिक अधिकारों का पुनर्गठन किया। 1879 से औपनिवेशिक सरकार भारत से अनुबंधित मजदूरों को मुख्यतः चीनी के बागानों में काम करने के लिए लाई। उनके वंशज फ़िजी की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बने, जबकि औपनिवेशिक नीतियों ने iTaukei और Indo-Fijian समुदायों के लिए अलग राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाएँ बनाए रखीं। इसलिए चीनी उत्पादन, भूमि-अधिकार व्यवस्था और सामुदायिक प्रतिनिधित्व लंबे समय तक ऐतिहासिक मुद्दे बने रहे। फ़िजी 1970 में स्वतंत्र हुआ। संसदीय राजनीति जातीय प्रतिनिधित्व, भूमि, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक शक्ति के वितरण से जुड़ी रही। 1987, 2000 और 2006 के सैन्य तख्तापलटों ने संवैधानिक शासन को बाधित किया। 2013 के संविधान के तहत 2014 के चुनावों ने संसदीय शासन बहाल किया; इसके बाद और चुनाव तथा सरकार में बदलाव हुए। समुदाय और राजनीतिक समूह इन घटनाओं की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। फ़िजी के इतिहास का विश्वसनीय विवरण तैयार करने के लिए मौखिक इतिहास, पुरातात्विक साक्ष्य, लिखित अभिलेख, चर्च दस्तावेज़, औपनिवेशिक रिपोर्ट, समाचारपत्र और व्यक्तिगत वृत्तांतों की तुलना करें। औपनिवेशिक स्रोत अक्सर स्थानीय समाजों को बाहरी धारणाओं से देखते हैं, जबकि मौखिक परंपराएँ वह ज्ञान सुरक्षित रख सकती हैं जो लिखित अभिलेखों में छूट गया हो। भूमि, मुखिया के अधिकार, प्रवासन और राजनीतिक वैधता से जुड़े ऐतिहासिक दावों को स्रोत की तारीख, उद्देश्य, लेखक और सामुदायिक दृष्टिकोण के आधार पर जाँचना चाहिए।
फ़िजी का इतिहास
फ़िजी का इतिहास प्रारंभिक प्रशांत बसावट, iTaukei समुदायों के विकास, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, भारत से प्रवासन और विविध आधुनिक राज्य के गठन को समेटता है। फ़िजी 1970 में स्वतंत्र हुआ, लेकिन राजनीतिक तनाव और सैन्य तख्तापलट उसके संस्थानों और सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करते रहे। इतिहास की व्याख्या में मौखिक परंपराओं, पुरातत्व, औपनिवेशिक अभिलेखों और विभिन्न समुदायों के अनुभवों पर विचार करना आवश्यक है।
सुझाव
फ़िजी के अतीत से जुड़े दावों को किसी एक अभिलेख या समुदाय की स्मृति से तय मानने के बजाय स्रोत-निर्भर समझें। भूमि, अधिकार, प्रवासन या राजनीतिक वैधता के सवालों पर अलग-अलग प्रकार के साक्ष्यों की तुलना करें और दर्ज करें कि किन व्याख्याओं पर विवाद है।

